सबके दिमाग में अपनी-अपनी पिक्चर चल रही हैADS -गैंग्स ऑफ वासेपुर में रामाधीर सिंह गुरुवार रात विकास दुबे के साथ जो हुआ उसको लेकर भी सबके दिमाग में अपनी-अपनी पिक्चर हैं. पहली पिक्चर उज्जैन के पुलिस ट्रेनिंग स्कूल से कारों का एक काफिला निकलता है और मक्सी की तरफ दाएं मुड़ जाता है. खामोशी को तोड़ती है कंटाप की एक आवाज. कानपुर का वर्ल्ड फेमस कंटाप जैसा नहीं बल्कि सिर के पीछे हल्की से चपत, जहां छोटा दिमाग होता है. 'तो बे दुबे, कहां खाएगा, गा*ड में या आ*ड में?' एक पुलिसवाले का सवाल और सबकी हंसी छूट जाती है. 'ई तो वासेपुर का डायलॉग है' दूसरा पुलिसवाला सवाल की मौलिकता पर जैसे सवाल उठाता है. 'राते रात में कानपुर पहुंचना है, रेस दिए रहो' एक और की आवाज कार शाजापुर से आगे कानपुर की ओर बढ़ती है. 'इस च*तिये की सुबह नहीं' पीछे से कोई हिंदी फिल्म के एक टाइटल के शब्दों से विकास को कुछ कहने के लिए उकसाता है. "एनकाउंटर" में मारा गया विकास दुबे (फोटो-PTI) विकास खामोश है. न अंजाम भुगतने की धमकी देता है, न न्यायिक जांच, वर्दी उतरवा लेने या अपने राजनीतिक रसूख की. न ये कह पाता है कि पुलिसवाले जो करने की बात कर रहे हैं, अगर वो करते हैं तो कैसे वो एक क्राइम होगा. 'पाप लगेगा, ब्रह्म हत्या का पाप' इस समय वो सिर्फ यही कह सकता है. ब्राह्मण की हत्या महापाप जो मानी गई है. 'और तुम जो मिश्रा जी को मारे, वो ब्रह्महत्या नहीं था, भोस*के? ' जवाब में एक पुलिसवाला विकास के हाथों मारे गए चौबेपुर के सीओ देवेंद्र मिश्रा की हत्या की याद दिलाता है. विकास कार के रियर व्यू शीशे से देखता है. पुलिस की कारों के अलावा भी सड़क पर कारें हैं. मीडिया की गाड़ियां पीछे-पीछे भाग रही हैं. उनकी फ्लैशलाइट में उसे उम्मीद की एक किरण दिखती है. विकास को उम्मीद थी कि अगर उसने अपनी गिरफ्तारी सुबह दे दी तो वो दिन में ही ट्रांजिट हो जाएगा. दिन के उजाले में एनकाउंटर आसान नहीं होते. हालांकि कुछ मामलों में दिन में भी एनकाउंटर हुए हैं. लेकिन अब रात गहरा चुकी है और वो सड़क पर है. एसटीएफ की सिक्योरिटी में असुरक्षित. काफिला एक के बाद एक टोल प्लाजा, गहरी नींद में सोते हुए गांवों, कस्बों और कस्बे से लगने वाले इलाकों को पार करता जाता है. इस सफर में खूब हंसी ठहाका है, ज्यादातर का निशाना विकास ही है. चौबेपुर थाने के तिवारी जी जैसे उसके वर्दीवाले दोस्तों के बीच ये चुटकलेबाजी होती तो वो खुद भी इनपर हंसता. लेकिन सादा कपड़ों में मौजूद पुलिसवालों के ये जोक विकास दुबे को परेशान कर रहे थे. तकरीबन सबको लगता है कि विकास को कोरोना है. और वो मामला निपट जाने के बाद टेस्ट कराने को लेकर परेशान हैं. टेस्ट के लिए भी जुगाड़ लगाना पड़ेगा. कंटाप जड़ते हुए एक पुलिस वाला कहता है- "वैसे मैं तो कुछ दिन परिवार से दूर ही रहूंगा, सब इस ... की वजह से". कंटाप इस बार असली था. पुलिसवाले खतरा मोल ले चुके थे...कोरोना का खतरा. पौ फटने लगी है. विकास के लिए भी उम्मीद की सुबह है कि वो शायद अब दिन देख सके. लेकिन ये फीकी मुस्कान ज्यादा देर रही नहीं. मीडिया की जो गाड़ियां उसके काफिले का पीछा कर रही थीं, वो रियरव्यू से अचानक गायब हो जाती हैं. पीछे सड़क पर उनको कोरोना वायरस की चेकिंग के नाम पर रोक लिया जाता है. सूरज निकल आया था, आकाश में लालिमा छाई थी लेकिन शायद ये सबकुछ भी मजाक ही था. सड़क पर कुछ पुलिसकर्मी इशारा करते हैं और कार रुकती है. कोई कहता है 'ब्रह्म हत्या', इस बार आवाज विकास दुबे की नहीं थी. और एक ब्राह्मण अफसर को ये काम दिया जाता है ताकि बाद में भी सब कुछ ठीक रहे... तड़ तड़ तड़ की आवाज...और सब खुश. 'गाड़ी पंक्चर कर दें.' 'ये तो सेम टू सेम प्रभात मिश्रा जैसा हो जाएगा. अलग सोचो यार. गाड़ी पलट दो.' 'ये सफारी नहीं पलटी जाएगी हमसे, छुटकी पलट दें.' 'कुछ भी पलट, जल्दी कर.' इसके बाद म्यूजिक बजता है, जिसकी आवाज कुछ ऐसी होती है.. लॉ लॉ लॉ, जाग रे मुर्गा जाग लॉ लॉ लॉ, भाग सके तो भाग लॉ लॉ लॉ, सड़क के नीचे रेत लॉ लॉ लॉ, पंटर हो गया खेत लॉ लॉ लॉ, काउंटर हुआ जनाब लॉ लॉ लॉ, बराबर हुआ हिसाब लॉ लॉ लॉ, क्या मागेंगी जवाब लॉ लॉ लॉ, बाबासाहेब की किताब म्यूजिक धीमा और कहानी खत्म. ------- पिक्चर-2 पुलिस का काफिला विकास दुबे को कानपुर ला रहा था. भौंती गांव के पास तेज रफ्तार कार पलट गई. विकास दो एसटीएफ अफसरों के बीच दब गया. उन दोनों को चोट लगी थी और खून निकल रहा था. उसने एक को ढक्का दिया और दूसरे पर चढ़कर खिड़की के टूटे हुए शीशे से खुद को बाहर निकाला. उसने जख्मी अफसर की पिस्तौल छीन ली थी और भागने लगा. दूसरी कारों में सवार पुलिस वालों ने उससे रुकने को कहा. उसने रुकने की बजाय फायरिंग कर दी. इसके बाद पुलिस की ओर से भी एक से ज्यादा राउंड फायरिंग हुई. विकास को गोली लगी. उसे तुरंत कानपुर के अस्पताल लाया गया. आते ही उसने दम तोड़ दिया. ये दिन की सबसे बड़ी खबर है. नमस्कार विकास दुबे को कानपुर लाया जा रहा था, लेकिन रास्ते में भौंती गांव के पास तेज रफ्तार कार पलट गई (फोटो-PTI) पिक्चर-2 पुलिस की कहानी है. पिक्चर-1 काल्पनिक है जो उन वेब सीरीज में काम आ सकती हैं जो लिखनी शुरू हो गई हैं. इनका किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति अथवा व्यक्तियों से संबंध महज संयोग है. आप, इन पिक्चर में से किसी पर भी यकीन कर सकते हैं लेकिन तथ्य नहीं बदलने वाले और हम तथ्य नहीं जानते. हम क्या जानते हैं इस मामले में तथ्य ये है कि विकास दुबे एक खूंखार अपराधी था. जो लोग बुधवार को उसके एनकाउंटर की आशंका जता रहे थे, वो गुरुवार को आरोप लगाने लगे कि सुविधाजनक गिरफ्तारी दिलाकर बीजेपी विकास दुबे को बचा रही है. शुक्रवार को जब विकास दुबे एनकाउंटर में मारा गया, तो भी वो हैरान थे. ‘आओ ट्विस्ट करें’ नया राष्ट्रगान बन जाता है. राजनीति में पगा माहौल सुविधाजनक तर्कों के साथ दौड़ने लगता है. ये अभिव्यक्ति की आजादी है लेकिन तर्क ठहरते नहीं हैं. क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम का विलाप अब घिसीपिटी बात है. अगर उसको अब तक मारा नहीं गया था, तो उसे बचाया जा रहा था. अब अगर वो मारा गया है, तो उसे मारा गया है क्योंकि वो खादी और खाकी से अपनी साठगांठ का खुलासा कर सकता था, और पुलिस खुद को बचाना चाहती थी. सच्चाई ये है कि विकास दुबे थाने में सत्तारूढ़ पार्टी के मंत्री की हत्या में जेल जा चुका था. उसको गिरफ्तार किया गया, मुकदमा चला और वो जेल में रहा. ऐसी किसी साठगांठ का कोई खुलासा नहीं हुआ. सारे गवाह जिनमें ज्यादातर वो पुलिसवाले थे जिन्होंने अपने थाने में उसे हत्या करते हुए देखा, मुकर गए. चार साल में ही दुबे बाहर आ गया. और हत्याएं करने के लिए, अपने राजनीतिक प्रोफाइल को मजबूत करने के लिए. अब भी वो यही सब जारी रख सकता था और अगला चुनाव लड़कर विधायक बन सकता था. ये होता क्योंकि आप जनप्रतिनिधि को नहीं मार सकते और एक बार का प्रतिनिधि, हमेशा के लिए लोकतांत्रिक ढंग से चुना हुआ नेता बन जाता है. बेशक उसके नेताओं से रिश्ते थे, ऊंचे पदों पर उसके दोस्त थे. यही वजह है कि 20 साल तक वो ये सब चलाता रहा. ये साठगांठ कोई छिपी हुई बात नहीं थी. ये यूपी है, महाराष्ट्र या दूसरे प्रदेशों जैसा नहीं, जहां या तो माफिया पर्दे के पीछे रहता है या दुबई में. यहां राजनीति और अपराध की साठगांठ का पोस्टरों-होर्डिंग्स में जमकर प्रचार होता है, ताकि कोई इससे अनजान न रहे. बच्चे-बच्चे को ये बात पता हो. उसके कबूलनामे से किसी को खतरा नहीं था. उसके पास ऐसा कोई सीक्रेट नहीं था जो वो पुलिस को बता सके. पुलिस महकमे में उसके अच्छे-खासे दोस्त थे, चौबेपुर में 8 पुलिसकर्मियों की हत्या से पहले तक वो उसके साथ काम करते थे. तो क्या इसका मतलब ये है कि हम ये एक्स्ट्रा ज्यूडिशियल किलिंग होने दें? जवाब है- नहीं. इसका मतलब सिर्फ इतना है कि क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम से आपकी ये उम्मीद कि वो आपकी पसंद के हिसाब से फैसला दे, सही नहीं है. अदालतों में पहले से पचास लाख मुकदमे लंबित हैं और उसमें एक और जुड़ने से कोई फर्क नहीं पड़ता. क्या इसका मतलब ये है कि मैं एनकाउंटर को सही ठहराते हुए कानून के राज का मजाक उड़ा रहा हूं. नहीं, इसका मतलब ये है कि विकास दुबे अब मर चुका है और चौबेपुर थाना क्षेत्र के पास अब चिंता करने के लिए 98 समस्याएं हैं, 99 नहीं. क्या मैं एनकाउंटर को जायज ठहरा रहा हूं? खैर, मुझे एक किसी और बनाना रिपब्लिक के बारे में बताइये जहां पुलिस वाले उस अपराधी को न मारते हों, जिसने पुलिस वालों को मारा हो! ये लेख मूल रूप से dailyo.in में प्रकाशित हुआ था, इसे अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
Saturday, 11 July 2020
विकास दुबे का एनकाउंटरः सबकी अपनी-अपनी पिक्चर
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